तुम उस दिन सफेद कपड़े में आयी थी, मैं तुम्हें ऐसे देख रहा था जैसे कोई परी आसमान से उतर आयी हो.. कालेज का आखिरी दिन होने के कारण से हम दोनों ही बेचैन थे.. इस असमंजस में थे की पता नहीं अब मुलाकात हो ना हो.. सभी कुछ खत्म होने के बाद हम भी अपने रस्ते चलने को तैयार थे, मगर कुछ वक्त एक दूसरे के साथ बिताने के इच्छुक भी.. टहलते हुये निकल परे, कदम जितना धीमा परे इसके जतन में.. एक आईस्क्रीम वाल दिखा और दोनों ने ही चोकोबार लिया और धीरे-धीरे खाने लगे.. थोड़ा प्यार-मनुहार भी कुछ शरारतें भी.. तभी कहीं से एक आवाज सी सुनाई देने लगी.. "तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे.. जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे.."
शायद कुछ गीतों कि उम्र बहुत लम्बी होती है.. जो बिन बुलाये अपनी धमक छोड़ जाती है.. गाहे-बगाहे सटीक तरीके से उस महौल में ढ़ल भी जाती है..
उस समय पहली बार ये अहसास हुआ की सच में मैं तुम्हें कभी भुला नहीं पाऊंगा.. कभी नहीं.. तुम आज भी मुझमें जिंदा हो, मेरे ख्वाबों में जिंदा हो.. हर पल तुम मेरे साथ होती हो.. कभी दोस्त बनकर.. कभी प्रेमिका बनकर.. कभी हितचिंतक बनकर.. तो कभी शत्रु बनकर.. हर पल में तुम्हें हजार बार जीता हूं..क्या तुम्हें याद है, आज कौन सा दिन है?

क्यों चली आती हो ख्वाबों में
क्यों भूल जाती हो
तुमने ही खत्म किया था
अपने उन सारे अधिकारों को
मुझ पर से
अब इन ख्वाबों पर भी
तुम्हारा कोई अधिकार नहीं
क्यों चली आती हो ख्यालो में
कभी नींद चुराने, कभी चैन चुराने
तुमने ही तो मुझे
अपने ख्यालों से निकाल फेंका था
अब मैं तुम्हारा
बहिष्कार करना चाहता हूं
पर तुम हो कि मानती ही नहीं
मेरे हिस्से कि दिन की गरमी
से घबरा उठी थी तुम,
अब क्यों रातों कि
चांदनी चुराने आती हो
ये शीतलता ही मेरे
जीने का भरोसा है
ये जैसे तुम जानती ही नहीं
वो कब इस जीवन में आयी और कब चली गई कुछ पता ही नहीं चला.. ऐसा लगता है जैसे जीवन के पांच साल यूं ही हवा में उड़ गये.. जीवन के सबसे खुशनुमा पांच साल.. उसकी कमी आज भी खलती है.. मन उदास भी होता है.. उसके वापस आने की कल्पना भी करता हूं.. मगर उसे पाने की कामना नहीं करता हूं.. उसके साथ जीवन के कयी खूबसूरत रंग देखे थे.. किसी के प्यार में आना क्या होता है यह भी उसका साथ पाकर ही जाना था.. उस प्यार का पागलपन.. उस प्यार की गहराई.. उस प्यार का अंधापन.. उस प्यार का दर्द.. वहीं उसके यूं ही चले जाने के बाद ही यह भी जाना की जिसे अंतर्मन से आप चाहते हैं और उसके बिना एक पल भी गुजारने का ख्याल भी डरा जाता हो, उसके अचानक यूं ही चले जाना.. बिना कुछ कहे.. बिना कोई कारण बताये.. शायद किसी अपने की मौत भी तो यूं ही होती है.. कहने को कई बातें होती है.. जिन बातों पर बहस होती थी उन्ही बातों को फिर से सुनने के लिये कान टरस जाते हैं.. अपनी भूल के लिये आप माफी मांगना चाहते हैं.. मगर कुछ कर नहीं सकते.. बस एक छटपटाहट अंदर तक रह जाती है जो अनगिनत रातें आपको पागलों कि तरह जगाती है.. तुम्हारे जाने से दुनिया को एक अलग नजरीये से भी देखा.. कई बुराईयां जिनसे दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था, उन्हें भी अपना लिया.. मगर शायद पहले से अच्छा इंसान हो गया.. लेकिन उससे क्या तुम्हारी कमी पूरी हो गई? मुझे पता है कि उत्तर तुम नहीं दोगी.. यहां जो नहीं हो.. मगर क्या यहां होने पर भी उत्तर देती? नहीं.. उत्तर हम दोनों को ही पता है.. नहीं.. क्यों चली गई तुम यह सवाल आज भी अंदर तक मुझे खाता है.. उस बेचैनी को धुंवे तले छिपाने की नाकाम कोशिशें भी करता हूं.. अक्सर कईयों से यह सुना है कि जब उदास हो तो उन पुरानी यादों को याद करना चाहिये जब हम बेवजह खुश हुआ करते थे.. मगर मैं किन यादों को याद करूं? सभी बेवजह की खुशियां भी तो तुमसे ही थी, जिन्हें तुम साथ ले गई.. हां! शायद दुनिया के लिये तुम हो इसी दुनिया में कहीं, मगर मेरे लिये तो तुम्हारा यूं ही चले जाना किसी मौत से कम नहीं है..
